पूर्वांचल कि आवाज न्यूज चन्दौली बृजेश कुमार केसरी
*माता कौशल्या ने सीता को नौलखा हार तो कैकेयी ने दिया कनक भवन*
*नौगढ़। दुर्गा मंदिर परिसर में आयोजित नव दिवसीय संगीतमय श्रीराम कथा के आठवें दिन कथावाचिका राघव प्रिया ओझा ने माता सीता की विदाई ससुराल में मुंह दिखाई वनवास व केवट प्रसंग का भावपूर्ण वर्णन किया।
कहा कि रामायण त्याग, समर्पण, प्रेम और मर्यादा की शिक्षा देने वाला महान ग्रंथ है। इसके प्रसंगों से मनुष्य को जीवन जीने की सही दिशा मिलती है।
कथावाचिका ने माता सीता की मुंह दिखाई का प्रसंग सुनाते हुए बताया कि माता कौशल्या ने सीता जी को नौलखा हार भेंट किया।
जबकि कैकेयी मैया ने उन्हें कनक भवन दिया। वहीं माता सुमित्रा ने अपने पुत्र लक्ष्मण को प्रभु श्रीराम की सेवा में समर्पित कर दिया।
उन्होंने माता सीता के कंचन काया स्वरूप का वर्णन करते हुए पारिवारिक प्रेम और समर्पण की महत्ता को बतलाया।
कहा कि मंदिर में यज्ञ, पूजा-पाठ अथवा धार्मिक अनुष्ठान में जाने पर अपनी श्रद्धा के अनुसार दान अवश्य करना चाहिए। दान ऐसी वस्तु का करना चाहिए जिसका जरूरतमंद व्यक्ति उपयोग कर सके। दान की सार्थकता तभी है। जब उससे किसी को लाभ मिले और उसकी जरूरत पूरी हो।
वनवास और केवट प्रसंग के माध्यम से उन्होंने भक्त और भगवान के बीच अटूट प्रेम की व्याख्या किया ।अयोध्या कांड को युवावस्था की कथा बताते हुए कहा कि इसमें त्याग और समर्पण की भावना प्रमुख है। रामायण और महाभारत का अंतर बताते हुए कहा कि भरत जी राज्य छोड़ने को तैयार हो गए, जबकि महाभारत में एक इंच भूमि नहीं देने के कारण युद्ध हुआ।
कथावाचिका ने कुएं के पानी का उदाहरण देते हुए कहा कि जल की निकासी होती रहे तो वह निर्मल बना रहता है। इसी तरह जीवन में दान, सेवा और सद्कर्म की धारा निरंतर बहती रहनी चाहिए।
भजन और भक्ति केवल बुढ़ापे का विषय नहीं है।बल्कि बचपन से ही बच्चों में अच्छे संस्कार विकसित करना चाहिए।
उन्होंने चिंता जताया कि कलियुग में धीरे-धीरे संस्कारों का लोप हो रहा है। आज संत समाज युवाओं को जागरूक कर सही दिशा दिखा रहा है। दशरथ जी के राज्याभिषेक को अगले दिन के लिए टालने का प्रसंग सुनाते हुए कहा कि शुभ कार्यों को कल पर नहीं टालना चाहिए।
भविष्य किसी ने नहीं देखा है।

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